खिलखिलाएल बाग मुर्झाय लागल छै ।
पेर पौधा, गाछके पात सुखाय लागल छै ।
जाहि बाग पर मालीके अटुट विश्वास छलै ।
उ विश्वास अखन डगमगाय लागल छै ।
. उमिद अखनो बाँकी छै ।
. बाट अखनो ताकैत छै ।
. मालीके विश्वास अखनो बाँकी छै ।
परिश्रम मात्र नइ, सञ्चित कएल जीवनके पूर्ण कमाई लागल छै ।
आब पैर जमिनो पर थरथराय लागल छै ।
मालीके बनाएल बाग मिझाय लागल छै ।
सुखल पात उठबैत छै दर्द दिलमे नुकबैत छै ।
. अन्दरसँ कनैत छै ।
. बाहरसँ हँसैत छै ।
. गम दिलमे रखैत छै ।
. पेर बागमे लगबैत छै ।
. माली बागमे रहैत छै ।
सोंचैत छै माली खिलखिलाएल बाग किया मुर्झाय लागल छै ।
कमि कि भेल बागके जे फुलल गुलाब सुखाय लागल छै ।
मौसमके बदलाबसँ खिलल बाग मुर्झाएल छै ।
शरद ऋतुके झोका छै, वसन्त ऋतु अएला पर फेर कहाँदन बाग खिलखिलाइ छै ।
. उमिद अखनो बाँकी छै ?
. बाट अखनो ताकैत छै ।
. मालीके विश्वास अखनो बाँकी छै ।

–बिशाल कुमार दुबे, पत्रकार