‘मातृशक्तिक आराधना करएबला एकटा कठोर पाबनि’

–सिमा चौधरी
जनकपुरधाम, १ असोज । संसारमे मातृशक्तिके तुलना अन्य किछुसँ नही कएल जासकैछ । कहबाक तात्पर्य जे स्त्रीके धर्तीके रूपमे देखल गेल छन्हि ।
अहि धर्ती पर अनेका–अनेक तरहक क्रियाकलाप अर्थात निकसँ निक आ बेजायसँ बेजाय होइत रहैत अछि । अपितु जननी अर्थात मायक रूपमे रहल धर्ती माँ अपन सन्तानके सुकर्म कुकर्म सभके नजरअन्दाज करैत अपन सन्तानके सुन्दर संसारलेल रचना करैत रहैत छथि ।
जौं सन्तान गल्ति पर गल्ति करैत सुधारके नाम नही लैत छथि त धर्ती माँ सन्तानके सुधार हेतु प्राकृतिक प्रकोपके रूप लैत छथि । ठीक ओही तरहें मातृशक्तिके परिभाषा दैत मिथिलाञ्चलमे अति कठोर मानल जाएबला जितिया पावनि सुरू भचुकल अछि ।
सन्तान, पति, भाय आ घरक सम्पूर्ण सदस्यक सुस्वास्थ्य, दिर्घायु, आरोग्य सहितक कामना लए मिथिलाक मिथिलानीसभ जितिया पावनिक शुरुवात कचुकल छथि । तिन दिवसीय रुपमे मनाओल जाएबला जितियाक पहिल दिन सप्तमी तिथि, दोसर दिन अष्टमी आ तेसर तथा अन्तिम दिन नवमी तिथिक होइत अछि ।
सप्तमी तिथि : अहि तिथमे नहाय खाय कएल जाइत अछि । ब्रती लोकनी चलता धारमे स्नान कए भिजले देह झिमनी पात वा घिराक पातपर जिमुतवाहनके तेल खरी आ पितैर – पितराइनके दहि चुरा प्रसादक रूपमे चढबैत छथि । प्रसाद चढेलाक बाद पुनः पवनैतिनसभ स्नान कए प्रसादक रूपमे रहल तेल घरक सम्पूर्ण सदस्यके लगबैत छथि आ पित्तर बला प्रसाद घरक चार या कुनो गाछतर राखल जाईत अछि ।
तहिना सप्तमीए तिथक अपन दिवंगत साउस आ मायके स्मरण करैत मिथिलामे पितराइन अहिबाती महिलाके शुद्ध भोजन खुएबाक परम्परा अछि । जितिया पावनि एकैटा एहन पावनि छैक जकर शुरुवात अशुद्ध भोजन यानी माछ मरुवाक रोटी खाक होइत अछि ।
अष्टमी तिथि : अष्टमी तिथिक भोरुकवा समयमे घरक सम्पुर्ण सदस्य मिलक औगठन करैत छथि । औगठनमे दहि, चुरा, अमोट, केरा सहित विभिन्न तरहक मर–मिठाई रहैत अछि । बितल जेठ असार मासमे आमसँ बनाओल गेल मिथिलाक मौलिक परिकार अमोटके विशेष महत्व रहैत अछि औगठनमे ।
गाम–घरमे औगठनक लक घरक धिया पुतासभ दुदिन पुर्वसँ विभिन्न तरहक योजना बना उत्साहित रहैत छथि, त घरक गृहणीसभ दहिक बास्ते दुध आ चुराक ओरियाओनमे व्यस्त रहैत छथि ।
कहल जाईत छैक औगठनक किछ अलग विशेषता छैक : यदि जिनका घरमे जितिया नहियोे चलैत हुवे हुनकोसभके औगठन करबाक चाहि । घरक घुरखुरमे ओटघनक पानि जरूर पिबाक चाहि, जाहिसँ भायक आयु दिर्घ होइत अछि । तहिना पहिल साल विवाह भेल विवाहिता महिलासभके नव सारी, नब लहठी पहिर औगठन करबाक परम्परा मैथिल समाजमे अखनो विद्यमान अछि ।
औगठनक पश्चात अष्टमी तिथी चढिते जितिया व्रत सुरू होइत अछि । अहि पावनिमे संप (थुक) नई घोंटए, अपनेसँ केश नही झारब, दतमैन नही करब, कहबाक मनशाय एहन कुनो कार्य नही करी जाहिमे किछ टुटे ।
सहनशीलताक आ संयमिताक उदाहरण दैत मिथिलाक मिथिलानिसभ सन्तानसहित घरक सम्पूर्ण सदस्यक आरोग्य, सुस्वास्थ्य, दिर्घायु सहितक कामना लए अति कठोर मानल जाएबला जितिया पावनि उत्साहपूर्वक करैत छथि ।
नव वस्त्र, नव लहठ्ठी, गरगहनासहित सोलह सिंगारमे सैज पवनैतिनसभ एक स्थानमे एकनित भए सियार आ चिल्हौरक कथा श्रवण करैत छथि ।
किछ वर्षसँ पवनैतिनसभ डाला सेहो भरैत छथि । बाँसक डालामे फलफुल, नरियल, चुरी, सिन्दुर टिकली, घरक पुरुषक बास्ते डाँराडोर रहैत अछि । एक ब्रतिक अनुसार डाला भरब बिध वितल किछुए वर्षसँ देखल जारहल अछि । हमसभ कहियो डाला नही भरैत छलहुँ मुदा हँ घरक पुरुषक वास्ते डाँराडोर आ स्त्रीगनक वास्ते सिन्दुर, चुरी जरूर किनैत छलहुँ ।
ओ आगा अहि सन्दर्भमे बाइज उठली कुनो भी पावनिके परिमार्जित केनाई उचित थिक अपितु ओ कतेक सान्दर्भिक अछि अहि सम्बन्धमे सोचनाई आवश्यक छैक ।
मातृशक्तिके तुलना किछु अन्य चिजसँ करब असम्भव छैक । २४, ३६ एतधरि कि ४०औं घण्टाधरि अष्टमी तिथि रहैत अछि, सभ व्रतक पारण प्रातकाल होइत अछि । मुदा अहि पावनिक पारणक समय तिथके हिसाबसँ होईत अछि ।
अपनसभक दाय मायक अनुसार यदि किनको सन्तान किछु अन्होनीसँ बचैत छथि त हुनक माय जरूर खरजितिया केने रहैत छथि ।
अहिबेरक यी व्रतक पारण झिम्नी फुल देखक होयत । कहबाक मतलब झिमनि फुल साँझक समयमे फुलाइत अछि । तएँ अपनासभक मिथिलामे साँझक पारणके झिमनी फुलसँ जोडल गेल अछि ।
नवमी तिथि : सहनशिल्ता आ संयमताक उदाहरण प्रस्तुत कए व्रतीसभ केरा या बाँसक पातपर खिरा अकुरी जिमुतवाहनके प्रसादक रूपमे चठा शुद्ध भोजनसँ पारण करैत छथि ।
अहिबिच, महिला अधकारकर्मीसभ जितिया पर्वक लेल राज्य सरकार आ प्रदेश सरकारसँ कामकाजी महिलालोकनीक लेल दु दिनके छुट्टीक माग सेहो करहल अछि ।
बितल किछ वर्षसँ जितियाक उत्साहमे मिथिलानिसभ देशक विभिन्न स्थान काठमाण्डु, जनकपुरधाम, वीरगन्ज, विराटनगर, राजविराज सहित बिभिन्न स्थानमे विविध कार्यक्रम सभक आयोजना सेहो करहल छथि ।
अन्तमे सम्पूर्ण मायसहित जितिया व्रत केनिहार पवनैतिनसभके जितियाक मङ्गलमय शुभकामना व्यक्त करैत छी । जिमुतवाहन सभक बालबच्चाके काया समांगसँ भरल पुरल रखथि ।
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