मधुश्रावणी : उमंग, उत्साह आ उद्दारक विशिष्ठ पावनी

सीमा चौधरी
जनकपुरधाम, ०१ भदौ । श्रावण मास, जे मन भावन मास अछि । श्री कृष्णक रासलिला आ झुलाके मास, प्रेमक पराकाष्ठाक मास । ओ प्रेम शिव भक्तिक हुवे वा प्रिय प्रियासीक प्रेम ।
श्रावण, मधुमास कहि या त साउन । प्रकृति बाबा दिगम्बर, औढरदानी, त्रिलोकीनाथक लय रुपसँ राग–अलाप करैत अछि । मन हृदय अति आनन्दमय भए प्रकृतिके हरियाली वातावरणमे हरियायल रहैत अछि, अहि सर्वोत्तम मासमे ।
बर्षाके झिसी आ प्रकृतिक कचोर हरियालीक मिलनसँ हरेक मनुष्यक मन आ तन प्रफुल्लित रहैत अछि । एहि सर्वोत्तम मास अर्थात मधुमासमे मिथिलाक नवविवाहिता कनियाँसभक उमंग, उत्साह आ उद्गारक विशिष्ट पावनी मधुश्रावणी सेहो मनाओल जाइत अछि ।
साउन मासमे कृष्णपक्षक पञ्चमी तीथिसँ आरम्भ भए शुक्ल पक्षक तृतिया तीथिधरि ई नवविवाहिता कनियाँसभ एकटा उत्सवके रुपमे ल उत्साह उमँगमे सजि–धजिक मधुश्रावणी ब्रतक अनुष्ठान करैत छथि । बहुत नियम निष्ठा आ विधि विधानपूर्वक पन्ध्र दिनधरि चलबला संकल्पित नव कनियाँसभ फूलबारी आ बाग–बगिचासँ फूलपात लोढबाक लेल स्वयंमे आनन्दित आ उत्साहित रहैत छथि । सोलहो श्रृंगार आ रंगबिरंगी लाल, पियर, हरियर वस्त्र पहिरक अपन सखी सहेलीसँग विभिन्न तरहक निश्छल प्रेमक संवाद करैत उत्साह आ उमंगमे रमायल रहैत छथि । कहल जाइत छैक, पहिलका समयमे ई साउन मासक पन्द्रह दिनके नवजोडीसभ हनीमूनक रुपमे लैत छल ।

एम्हर, अहि पन्द्रह दिनक पूजाक अन्तरालमे नवविवाहिता कनियाँसभ संयम–नियमसँग अनेक तरहक मिथिलाक व्यवहारिक कला, गीतनाद ९बटगवनी, मलार, बारहमासा०, अरिपन, पूजा–पाठक विधि व्यवहार आ श्रृंगारपटार सहित अनेको कतेकरासक मिथिलाक परम्परासभ सिखके अवसर भेटैत अछि । जे हुनकर गृहस्थ जीवनक लेल बहुत उपयोगी होइत अछि । सामान्यतः तेरह दिनधरि मनाओल जाएवला ई पावनीमे गौरी, गणेश, बिषहरारसैठ आ बाबा भोलेदानीक पूजा कएल जाइत अछि ।

पहिल दिन अर्थात् मौना पंचमी दिनसँ मधुश्रावणी धरि क्रमशः बिसहराक जन्मक कथा, मनसा आ मङ्गला गौरीक कथा, पृथ्वीक उत्पत्ती, समुद्र मन्थन, सतीक पतिब्रताके कथा, शिवक पारिवारिक कथा, गङ्गाके उत्पत्ती, गौरीक तपस्या, गौरीक विवाहक कथा, कार्तिक आ गणेशक जन्म, सन्धा आ लिलीक विवाह, सुकन्या, बालबसन्त आ गोसाउनीक कथा, राजश्रीकर आ गणेशद्वारा कएल गेल सुहाग मन्थनक कथा श्रवण कएल जाइत अछि ।
मिथिलाक एकटा याह पावनी थिक जाहिमे पण्डितके भूमिकामे महिला रहैत छथि ।
मधुमासक शुक्ल तृतीया तीथि अति उत्तम तीथि होइत अछि । देश सहित विदेशमे रहयबाली तथा काम–काजी महिलासभ सेहो ई उत्तम तीथिमे अप्पन अखण्ड सुहागक कामना करैत बहुत हर्षोल्लासकसँग मधुश्रावणी व्रत करैत छथि । जेकरा नव परिवर्तीत समयमे ‘हरियाली तीज’ क नाम देल गेल अछि ।
मधुश्रावणीक अन्तिम दिन नवकनियाँके टेमी सेहो देल जाइत अछि ।

टेमी – जे नारीत्व गुण, सहनशीलता आ समर्पणक प्रतिक अछि । अपनसभक मिथिलाक परम्पराक लोक संस्कृतिक आस्थासँग जुडल विधि अछि । अखनके समाज शिक्षित आ विकासशील भेल अछि । जे अहि टेमी विधि पर बिभिन्न तरहक तर्क–वितर्क करैत छथि । हुनकर सभक तर्कमे ई विधि पुरुष प्रधानता आ नारी शोषणके प्रतिक अछि । मुदा अहि मादे हम ई कहब जे कोनो परम्पराके विस्थापनक हेतु नयाँ प्रमाणिक तथ्य प्रस्तुत होबएके चाही । यदि टेमीसँ पीडा होइत छैक त किया अखन स्त्रीसभ स्वेच्छासँ शरीरक विभिन्न अङ्गमे टेटु ९गोदना० बनबैत छथि रु जे टेमीके पीडासँ दश गुणा बेसी पीडादायी होइत अछि । हमर आहाँक ई मिथिलाक विधि–व्यवहारसभ सदैव शुभकारी आ कल्यणकारी होइत अछि । मिथिलाक विधि–व्यवहार, कला, संस्कृति आ परम्पराके जीवन्त रखनाइ अति आवश्यक छैक । हमरा गर्व अछि जे हम ई सुन्दर मिथिलाक धीया छी आ हमर अहोभाग्य जे आइ हमर विधि–व्यवहारके सँजोगिक राखएमे अग्रसर छी । हमर पावनि–तिहार आ विधि–व्यवहार तिलकोरक लत्ती जेहन चतरैत रहए आ हरियाल रहए । श्रीकृष्ण भगवानक रासलिलाके स्मरणमे मिथिलाक जनकपुरधामके सभ मठ, मन्दिर आ सन्तकुटीसभमे परापूर्वकालसँ चलैत आबिरहल साउन मासके भगवानक झुलनमे हम–हाँ सहभागि छी ।
अन्तमे, साउन मासक हरियाली जेहन सभगोटेक जीवन सदैव हरियाल रहएसे कामना करैत मधुश्रावणी पावनी करएबाली सम्पूर्ण मिथालानीमे मंगलमय शुभकाना व्यक्त करैत छी ‘
जय मिथिला जय मैथिल ।
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