– प्रतिभा झा

जनकपुरधाम, २७ पुस ।

महसुस कऽ रहल छि ओ छाँयाके

निर्मल सुन्दर ओ कायाके

जिनका छोरए पड़ल संसारके

त्यागए पड़लन्हि अपन भारके

दोस कि बुझल नहि,

रहस्य कि खुजल नहि

नहि देख स्नेह, प्रेम

हुनका मेटाओल गेल

अपरिचित लगा देहसँ

प्राण छिनाओेल गेल

किए कएल एतेक घोर अन्याय ?

कि कोनो चुक भऽ गेल ??

लऽ लेलहुँ एकटा नवनितिके प्राण

कि आब पेट भरि गेल ?

कियो किछो कहथि

अपराधिके अपनो हएत विरान

विधाता बास नहि दिए

जे लेलक उमा दिदिके जान ।