सिमा चौधरी, ३ असार । मिथिलामे परापूर्वकालसँ अखनधरि एकटा परम्परा चलैत आबिरहल छैक । एक दोसरके खोंइछ देबाक परम्परा । चाहे ओ गामघर हुवे वा शहर बजारक नव परिवेश । खोंइछमे अरबा चाउर, हरैदके पाँचटा ठेसर, हरियर दुइभ, ललका फूल आ यथाशक्ति दक्षिणा रहैत छैक । आ इ प्रत्येक वस्तुक अपन–अपन महत्व छैक ।

१.चाउर : भण्डार भरल रहबाक लेल
२.हरैदक ठेसर : मंगल होयबाक लेल
३. दुइभ : परिवारके संजीवनी देबाक लेल
४. ललका फूल : जिवन फूले जँका सदैब सुगन्धित रहबाक कामनाक लेल
५.दक्षिणा अर्थात रुपैयाँ : मजबुत आर्थिक स्थितिक शुभकामनाके प्रतिक 

खाेंइछ एक अहिबाति महिलाद्वारा दोसर अहिबाति महिलाके देबाक परम्परा अछि मिथिलामे । एकर शुरुवात तखन होइत अछि जखन बेटी विवाहपश्चात् पहिलबेर दुरागमन भए सासुर जाइत छथि । हुनक माय, पितियाइन या कुनो अहिबाति महिलाद्वारा खोंइछ देल जाइत अछि । अहिसँ बेटीक नव–जिवन शुरुवातक आशिष होइत छैक से जनविश्वास अछि ।

बेटीक खोइछमें धान, जिर, मिठ्ठासँ बनल पुरी सहित हरैद, सिन्दुर, फूल, दुइभ आ दक्षिणा रहैत अछि । बेटीक खोंइछमे धान देबाक मतलब हुनक जीवन सदैब धन धान्यसँ भरल पुरल रहे । तहिना, पुतहुके खोंइछमे धानक बदला चाउर देल जाइत अछि ।

अहि सन्दर्भमे हम एकटा आर मिथिलाक सुन्दर परम्पराके जोरए चाहब । यदि बेटी सासुरसँ नैहर अबैत छथि त हुनकालेल बनाओल गेल पकवानमे बरी जरूर बनाओल जाइत छैक । आ कहल जाइत छैक जे बेटीके बरी खुएबाक अर्थ अछि ओ बरीए जँका सदैब फुलल रहथि आ २१ दिन नैहर बासक २२ अम दिन पुनः अपन सासुर बैसथि । ठिक ओहितरहे पुतहुकेवास्ते खिर बनाओल जाइत अछि । खिरक मिठसन अहाँक बोली बचन आ व्यवहार हुवए से कामना कएल जाइछ ।

आब फेरसँ चर्चा करी खोंइछक सम्बन्धमे । खोंइछक सम्बन्धमे एक वृद्धक कहब जहिनाक तहिना : गे बउवा आब लोक कि दैत छथि बेटीक खोंइछमे, दैत त छल हमरासभक समयमे । बेटीक दुरागमनक खोंइछमे विग्हाके विग्हा जमिन, कलम, पोखरी आ हाथी देल जाइत छल । आबक माय–बाप हजार/पाँच सय टका या बडसँ बड नाकक फुलिया दए बेटीके सासुर पठबैत छथिन ।

ओ अहि सम्बन्धमे आगा जानकारी दैत कहलथि खोंईछक ओरियान बाँससँ बनल सुप, चंगेरा, डगरीमे करी, जे वंशक वृद्धिक प्रतीक अछि । तहिना खाेंइछ भगवतीए घरमे लिए आ भगवतीएक घरमे खोली जे महिलाक जीवनके आशिष होइत अछि ।

एम्हर, खोंइछ भरएके धार्मिक महत्व सेहो अछि । दुर्गा पूजा, काली पूजा, सरस्वती पूजाक अवसरपर अहिबाती महिलासभद्वारा हर्षउल्लासकसँग खोंइछ भरल जाइत अछि । मान्यता अछि, मैयाके जे महिला सोलहहो श्रृंगार कए खोंइछ भरैत छथि हुनकापर माँके असिम अनुकम्पा आ धनधान्यसँ भरल पुरल आशीर्वाद बनल रहैत अछि ।

ब्राम्ह्ण सहित किछ जातिमे होबएबला मुण्डन, उपनयनमे पाँच/सात या नौंटा अहिबाती महिलाके भगवतीक घरमे खोंइछ देबाक परम्परा सेहो अछि मिथिलामे । जकरा हम अहाँ ’सिनुरहार’ नामसँ जनैत छि । एखनुक बदलैत समयमे सेहो मिथिलाक मिथिलानीसभ खोंइछ देबाक परम्पराके रुचीपूर्वक निरन्तरता दरहल छथि । कुनो पाबनि त्योहार हुवे या पाबनि त्योहारकवास्ते मनाओल जाएबला कार्यक्रम, खोंइछ देबाक चलनके प्राथमिकतामे राखल जाइछ ।

माथपर धसा या पटमाइस ?

लिक्विड बला सिन्दुर, टिकुली, चुरी धए एक दोसरके खोंइछ दए हुनक परिवारके मंगल कामना करैत छथि । ई सुन्दरसन परम्परा हमरा–अहाँक धरोहर थिक । आ बहुतरास यादसँ जोडने सेहो अछि । ई हमर–अहाँक मिथिलाक संस्कार छैक । अपन मिथिलाक संस्कार आ अपन संस्कृति तथा धरोहरके सभगोटे मिलकए सदैब निरन्तरता दैत बचेनाइ जरूरी छैक ।

हमर अहाँक आबएबला पिढीसभ एहि परम्परासँ अवगत होइत रहथि जे हमर अहाँक कर्तव्य सेहो अछि । आ ओहोसभ अई संस्कार आ संस्कृतिसँ गौरवान्वित होइत रहथि । मिथिलाक हरेक बिध व्यवहार स्वयंममे अलौकी छैक । हमसभ दोसरके संस्कारके कम अपनाबी आ अपन मिथिलाक संस्कृतिके उजागर करैत रहि ।

जय मिथिला जय मैथिली